Tuesday, December 8, 2009

घर से दूर चले जाने पर आती है घर की याद

घर से दूर चले जाने पर आती है घर की याद
माँ के आँचल की छाँव में गुज़ारे वो पल
और पापा का वो अनुशासित लाड प्यार
वो सुबह सुबह मंदिर से आती आरती की आवाज़
और नुक्कड़ वाली मस्जिद में होने वाली रोज़ की अज़ान
पड़ोस वाली चाची के चूल्हे से उठती रोटियों की महक
या हलवाई काका के खस्ते में पुदीने की चटनी का स्वाद
बाबा का गेट से चिल्लाना की ऑटो वाला आया
और बच्चों का रोना की आज फिर स्कूल नहीं जाना
सामने वाली आंटी का छत पर खुद को मेंटेन करने का प्रयास
और उसी समय शर्मा अंकल का अपनी मुंडेर पर योग का अभियान
तिवारी अंकल का तेज़ी से तैयार होकर ऑफिस जाना
और पीछे से आंटी का हडबडाते हुए टिफीन लेकर आना
कुछ ऐसी ही हैपेनिंग सुबह में अलसाये से हमारा उठना
पेपर और चाय का कप हाथ में लेकर बालकनी में धूप सेकना
आह...याद आती है वो सुबह जो तब हुआ करती थी रोज़ का किस्सा
वो घर जो पीछे छोड़ आये हम और बन गए दुनिया की इस भेड़-चाल का हिस्सा

6 comments:

  1. i simply loved the feel of this piece...the quintessential mundane morning being elevated to bring back fond memories...keep delighting :)

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  2. आपने बहुत खूबी से अपने ' नॉस्टेल्जिया' अनुभव को कविता में प्रयोग किया .
    बधाई !

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  3. thats true....Everyone who is not in their place of birth or the place they call "HOME", sometimes has those moments when you REALLY miss home.
    East or west,
    Home is the best.

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  4. ..that reminds me of my home .. indeed,we miss our home .

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  5. रविन्द्र पाण्डेयThursday, February 04, 2010 2:48:00 AM

    आपने तो घर की यादें ताजा कर दी ... बहुत खूबसूरत और मार्मिक रचना है ।

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